एक सवाल बुद्ध से ....
सुनो सिद्धार्थ,
जब तुम खोज रहे थे
जीवन मे दुख का कारण
तब मैं जूझ रही थी
नन्हे राहुल के मासूम सवालों से
सवाल,जो उसके पिता के लिए थे
तुम मृत्यु से व्यथित
तुम बीमारी से व्यथित
तुम बुढ़ापे से व्यथित
कहाँ जान पाए तुम
कि व्यथा इन सबसे परे होती है
मृत्यु दुख नही है
मृत्यु मुक्त करती है
दुख जीवन होता है
वह जीवन जो साथी के पलायन के बाद
पीछे बचता है
बुढ़ापा सिर्फ प्रकृति की एक अवस्था है
अभिशप्त यौवन होता है
जो तुम्हारे बाद मेरे पास था.
शरीर के रोग का तो फिर भी इलाज है
पर मन का रोग जो तुम छोड़ गए मेरे पास
तुम्हारे दर्शन में उसका कोई जिक्र आया या नही
मेरे परोसे थाल को ठुकराकर
आखिर तुमने ग्रहण किया
सुजाता की खीर का पात्र
क्या तब भी नही गुन सके
कि भूख एक शास्वत सत्य है
तुम्हारे बौद्ध विहार में
आम्रपाली सी नगर वधू भी स्थान पा सकी
नही समा पाए तो बस पत्नी और पुत्र
इस दुःख का भी दर्शन खोज सके हो क्या
सुनो सिद्धार्थ,
दिग-दिगांतर तक विस्तृत हुआ
तुम्हारा दर्शन
तुम्हारा बौद्धिक व आध्यात्मिक साम्राज्य
पर मेरा विस्तार तो सिर्फ तुम थे..
सिद्धार्थ से बुद्ध होने की
तुम्हारी इस यात्रा में
मैं कहाॅ हूं
साभार : यशोधरा की व्यथा
(मधुलिका चौधरी )
सुनो सिद्धार्थ,
जब तुम खोज रहे थे
जीवन मे दुख का कारण
तब मैं जूझ रही थी
नन्हे राहुल के मासूम सवालों से
सवाल,जो उसके पिता के लिए थे
तुम मृत्यु से व्यथित
तुम बीमारी से व्यथित
तुम बुढ़ापे से व्यथित
कहाँ जान पाए तुम
कि व्यथा इन सबसे परे होती है
मृत्यु दुख नही है
मृत्यु मुक्त करती है
दुख जीवन होता है
वह जीवन जो साथी के पलायन के बाद
पीछे बचता है
बुढ़ापा सिर्फ प्रकृति की एक अवस्था है
अभिशप्त यौवन होता है
जो तुम्हारे बाद मेरे पास था.
शरीर के रोग का तो फिर भी इलाज है
पर मन का रोग जो तुम छोड़ गए मेरे पास
तुम्हारे दर्शन में उसका कोई जिक्र आया या नही
मेरे परोसे थाल को ठुकराकर
आखिर तुमने ग्रहण किया
सुजाता की खीर का पात्र
क्या तब भी नही गुन सके
कि भूख एक शास्वत सत्य है
तुम्हारे बौद्ध विहार में
आम्रपाली सी नगर वधू भी स्थान पा सकी
नही समा पाए तो बस पत्नी और पुत्र
इस दुःख का भी दर्शन खोज सके हो क्या
सुनो सिद्धार्थ,
दिग-दिगांतर तक विस्तृत हुआ
तुम्हारा दर्शन
तुम्हारा बौद्धिक व आध्यात्मिक साम्राज्य
पर मेरा विस्तार तो सिर्फ तुम थे..
सिद्धार्थ से बुद्ध होने की
तुम्हारी इस यात्रा में
मैं कहाॅ हूं
साभार : यशोधरा की व्यथा
(मधुलिका चौधरी )
यदि प्रेम एक संख्या है
तो निश्चित ही
विषम संख्या होगी....
तो निश्चित ही
विषम संख्या होगी....
इसे बांटा नहीं जा सकता कभी
दो बराबर हिस्सों में.
दो बराबर हिस्सों में.
[प्रेम का गणित ]
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तुम्हारे प्रेम में डूब गयी....
नहीं चाहती थी डूबना
डूब कर अपना अस्तित्व खोना मुझे नापसंद था
डूब कर अपना अस्तित्व खोना मुझे नापसंद था
उत्प्लावक के सिद्धांत तय करते हैं शर्तें - तैरते रहने की.
डूब जाने की कोई शर्त नहीं!!!!
डूब जाने की कोई शर्त नहीं!!!!
[प्रेम का भौतिक शास्त्र ]
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~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
शायद तुम कुछ कहते नहीं
और क्यूँ मेरी सदायें पहुँचती नहीं,, तुम तक ??
oh!! sound needs a medium to travel....
(हमारे बीच ये निर्वात (Vacuum) आखिर कब पनपा???)
अब हमारी wavelengths भी match नहीं करतीं शायद !!
[प्रेम का वैज्ञानिक दृष्टिकोण]
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प्रेम का एक पल
छिपा लेता है अपने पीछे
दर्द के कई कई बरस....
छिपा लेता है अपने पीछे
दर्द के कई कई बरस....
कुछ लम्हों की उम्र ज्यादा होती है, बरसों से !!
[ प्रेम की प्रकृति....होती है समझ के परे !! ]
(अनु)
बचपन से सुनती आयी थी
वो अटपटी सी कविता
न अर्थ जानती थी
न सुर समझती....
कविता थी या गीत ???
मचलती आवाज़ से लेकर
खरखराती ,कांपती आवाज़ तक
जाने कितनी बार सुना
लफ्ज़ रटे हुए थे...
जब जब कहती
तब तब वो बेहिचक सुनाने लगते
और मैं खूब हंसती...
बस अपने बाबा की बच्ची बन जाती.......
बरसों बाद...
उस रोज़
उस जीर्ण काया के सिरहाने खडी
अचानक वही गीत गाने लगी..
अनायास ही
लगा कि वो मुस्कुराए...
कस के हाथ थामे खडी गुनगुनाती रही....
अटपटे बेमानी से शब्द,
जो सुना था वही दुहराती रही.......
वही मुस्कान चेहरे पर लिए
पिता के दिल ने
आख़री बार हरकत की
और फिर शान्ति...
मानो गहरी नींद में चले गए हों......
एक कौतुहल जागा मन में...
और जाने पहले ये ख़याल क्यूँ नहीं आया था ...
खोजबीन की तो पता लगा
वो अटपटा गीत,जिसके अर्थ से अनजान थी
वो एक लोरी थी.....जो गुनगुनाया करते थे पापा........
और जब मैंने गुनगुनाया तो वे सचमुच सो गए
शायद सुख सपनों में कहीं खो गए.....
(अनु)
वो अटपटी सी कविता
न अर्थ जानती थी
न सुर समझती....
कविता थी या गीत ???
मचलती आवाज़ से लेकर
खरखराती ,कांपती आवाज़ तक
जाने कितनी बार सुना
लफ्ज़ रटे हुए थे...
जब जब कहती
तब तब वो बेहिचक सुनाने लगते
और मैं खूब हंसती...
बस अपने बाबा की बच्ची बन जाती.......
बरसों बाद...
उस रोज़
उस जीर्ण काया के सिरहाने खडी
अचानक वही गीत गाने लगी..
अनायास ही
लगा कि वो मुस्कुराए...
कस के हाथ थामे खडी गुनगुनाती रही....
अटपटे बेमानी से शब्द,
जो सुना था वही दुहराती रही.......
वही मुस्कान चेहरे पर लिए
पिता के दिल ने
आख़री बार हरकत की
और फिर शान्ति...
मानो गहरी नींद में चले गए हों......
एक कौतुहल जागा मन में...
और जाने पहले ये ख़याल क्यूँ नहीं आया था ...
खोजबीन की तो पता लगा
वो अटपटा गीत,जिसके अर्थ से अनजान थी
वो एक लोरी थी.....जो गुनगुनाया करते थे पापा........
और जब मैंने गुनगुनाया तो वे सचमुच सो गए
शायद सुख सपनों में कहीं खो गए.....
(अनु)
कुछ शब्द हैं जो अपमानित होने पर
स्वयं ही जीवन और भाषा से
बाहर चले जाते हैं
'पवित्रता' ऐसा ही एक शब्द है
जो अब व्यवहार में नहीं,
उसकी जाति के शब्द
अब ढूंढें नहीं मिलते
हवा, पानी, मिट्टी तक में
ऐसा कोई जीता जागता उदहारण
दिखाई नहीं देता आजकल
जो सिद्ध और प्रमाणित कर सके
उस शब्द की शत-प्रतिशत शुद्धता को !
ऐसा ही एक शब्द था 'शांति'.
अब विलिप्त हो चुका उसका वंश ;
कहीं नहीं दिखाई देती वह --
न आदमी के अन्दर न बाहर !
कहते हैं मृत्यु के बाद वह मिलती है
मुझे शक है --
हर ऐसी चीज़ पर
जो मृत्यु के बाद मिलती है...
शायद 'प्रेम' भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसकी अब
यादें भर बची हैं कविता की भाषा में...
ज़िन्दगी से पलायन करते जा रहे हैं
ऐसे तमाम तिरस्कृत शब्द
जो कभी उसका गौरव थे.
वे कहाँ चले जाते हैं
हमारे जीवन को छोड़ने के बाद?
शायद वे एकांतवासी हो जाते हैं
और अपने को इतना अकेला कर लेते हैं
कि फिर उन तक कोई भाषा पहुँच नहीं पाती.......
(कुंवर नारायण)
स्वयं ही जीवन और भाषा से
बाहर चले जाते हैं
'पवित्रता' ऐसा ही एक शब्द है
जो अब व्यवहार में नहीं,
उसकी जाति के शब्द
अब ढूंढें नहीं मिलते
हवा, पानी, मिट्टी तक में
ऐसा कोई जीता जागता उदहारण
दिखाई नहीं देता आजकल
जो सिद्ध और प्रमाणित कर सके
उस शब्द की शत-प्रतिशत शुद्धता को !
ऐसा ही एक शब्द था 'शांति'.
अब विलिप्त हो चुका उसका वंश ;
कहीं नहीं दिखाई देती वह --
न आदमी के अन्दर न बाहर !
कहते हैं मृत्यु के बाद वह मिलती है
मुझे शक है --
हर ऐसी चीज़ पर
जो मृत्यु के बाद मिलती है...
शायद 'प्रेम' भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसकी अब
यादें भर बची हैं कविता की भाषा में...
ज़िन्दगी से पलायन करते जा रहे हैं
ऐसे तमाम तिरस्कृत शब्द
जो कभी उसका गौरव थे.
वे कहाँ चले जाते हैं
हमारे जीवन को छोड़ने के बाद?
शायद वे एकांतवासी हो जाते हैं
और अपने को इतना अकेला कर लेते हैं
कि फिर उन तक कोई भाषा पहुँच नहीं पाती.......
(कुंवर नारायण)
व्यर्थ नहीं हूँ मैं!
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे ही कारण हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम।
मैं स्त्री हूँ!
सहती हूँ
तभी तो तुम कर पाते हो गर्व अपने पुरूष होने पर
मैं झुकती हूँ!
तभी तो ऊँचा उठ पाता है
तुम्हारे अंहकार का आकाश।
मैं सिसकती हूँ!
तभी तुम कर पाते हो खुलकर अट्टहास
हूँ व्यवस्थित मैं
इसलिए तुम रहते हो अस्त व्यस्त।
मैं मर्यादित हूँ
इसीलिए तुम लाँघ जाते हो सारी सीमायें।
स्त्री हूँ मैं!
हो सकती हूँ पुरूष...
पर नहीं होती
रहती हूँ स्त्री इसलिए...
ताकि जीवित रहे तुम्हारा पुरूष
मेरी नम्रता, से ही पलता है तुम्हारा पौरुष
मैं समर्पित हूँ!
इसीलिए हूँ उपेक्षित, तिरस्कृत।
त्यागती हूँ अपना स्वाभिमान
ताकि आहत न हो तुम्हारा अभिमान
जीती हूँ असुरक्षा में
ताकि सुरक्षित रह सके
तुम्हारा दंभ।
सुनो!
व्यर्थ नहीं हूँ मैं!
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे कारण ही हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम........
(कविता किरण)
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे ही कारण हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम।
मैं स्त्री हूँ!
सहती हूँ
तभी तो तुम कर पाते हो गर्व अपने पुरूष होने पर
मैं झुकती हूँ!
तभी तो ऊँचा उठ पाता है
तुम्हारे अंहकार का आकाश।
मैं सिसकती हूँ!
तभी तुम कर पाते हो खुलकर अट्टहास
हूँ व्यवस्थित मैं
इसलिए तुम रहते हो अस्त व्यस्त।
मैं मर्यादित हूँ
इसीलिए तुम लाँघ जाते हो सारी सीमायें।
स्त्री हूँ मैं!
हो सकती हूँ पुरूष...
पर नहीं होती
रहती हूँ स्त्री इसलिए...
ताकि जीवित रहे तुम्हारा पुरूष
मेरी नम्रता, से ही पलता है तुम्हारा पौरुष
मैं समर्पित हूँ!
इसीलिए हूँ उपेक्षित, तिरस्कृत।
त्यागती हूँ अपना स्वाभिमान
ताकि आहत न हो तुम्हारा अभिमान
जीती हूँ असुरक्षा में
ताकि सुरक्षित रह सके
तुम्हारा दंभ।
सुनो!
व्यर्थ नहीं हूँ मैं!
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे कारण ही हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम........
(कविता किरण)
नए जूते
शो-रूम की चमचमाती विंडो में बेचैन
उचकते हैं
उछलते हैं
आतुर देख लेने को
शीशे के पार की फंतासी दुनिया
नए जूते
दौड़ना चाहते हैं धड़ पड़
सूंघना चाहते हैं
सड़क के काले कोलतार की महक
वे नाप लेना चाहते हैं दुनिया
छोड़ देना चाहते हैं अपनी छाप
ज़मीन के हर अछूते कोने पर
बगावती हैं नए जूते
काट खाते हैं पैरों को भी
अगर पसंद ना आये तो
वे राजगद्दी पर सोना चाहते हैं
वो राजा के चेहरे को चखना चाहते हैं
नए जूतों को नहीं पसंद
भाषण , उबाऊ बहसें , बदसूरती
उम्र की थकान
वे हिकारत से देखते हैं
कोने में पड़े उधड़े बदरंग
पुराने जूतों को
पुराने जूते
उधड़े बदरंग
पड़े हुए कोने में परितक्य किसी जोगी सरीखे
घिसे तलों , फटे चमड़े के बीच
देखते हैं नए जूतों की बेचैनी ,हिकारत
मुह घुमा लेते हैं
पुराने जूतों को मालूम है
शीशे के पार की दुनिया की फंतासी की हक़ीकत
पुराने जूतों नें कदम दर कदम
नापी है पूरी दुनिया
उन्हें मालूम है समन्दर की लहरों का खारापन
वो रेगिस्तान की तपती रेत संग झुलसे हैं
पहाड़ के उद्दण्ड पत्थरों से रगड़े हैं कंधे
भीगे हैं बारिश के मूसलाधार जंगल में कितनी रात
तमाम रास्तों , दर्रों का भूगोल
नक्श है जूतों के जिस्म की झुर्रियों में
पुराने जूतों नें चखा है पैरों का नमकीन स्वाद
सफ़र का तमाम पसीना
अभी भी उधड़े अस्तरों में दफ़न है
पुराने जूते
हर मौसम में पैरों के बदन पर
लिबास बनकर रहे हैं
पुराने जूतों नें लांघा है सारा हिमालय
अन्टार्टिका की बर्फ के सीने को चूमा है
पुराने जूतों नें लड़ी हैं तमाम जंगें
अफगानिस्तान, फलिस्तीन , श्रीलंका , सूडान
अपने लिए नहीं
(दो बालिश्त ज़मीन काफी थी उनके लिए )
पर उनका नाम किसी किताब में नहीं लिखा गया
उन जूतों नें दौड़ी हैं अनगिनत दौडें
जिनका खिताब परों के सिर पर गया
मंदिर के बाहर ही रह गए हैं पुराने जूते हर बार
वो जूते खड़े रहे सियाचिन की हड्डी-गलाऊ सर्दी में मुस्तैद
ताकी बरकरार रहे मुल्क के पैरों की गर्मी
पुराने जूतों नें बनाए हैं राज-मार्ग ,अट्टालिकाएं , मेट्रो पथ
बसाए हैं शहर
उगाई हैं फसलें
पुराने जूतों नें पाँव का पेट भरा है
उन जूतों नें लाइब्रेरी की खुशबूदार
रंगीन किताबों से ज्यादा देखी है दुनिया
पुराने जूते खुद इतिहास हैं
बा-वजूद इसके कभी नहीं रखा जायेगा उनको
इतिहास की बुक-शेल्फ में
पुराने जूतों के लिए
आदमी एक जोड़ी पैर था
जिसके रास्तों की हर ठोकर को
उन्होंने अपने सर लिया
पुराने जूते भी नए थे कभी
बगावती
मगर अधीनता स्वीकार की पैरों की
भागते रहे ता -उम्र
पैरों को सर पर उठाये
पुराने जूते
देखते हैं नए जूतों की अधीरता , जूनून
मुस्कुराते हैं
फिर हो जाते हैं उदास
पता है उनको
के नए जूते भी बिठा लेंगे पैरों से ताल-मेल
तुड़ाकर दांत
सीख लेंगे पैरों के लिए जीना
फिर एक दिन
फेंक दिए जायेंगे
बदल देंगे पैर उन्हें
और नए जूतों के साथ
(अपूर्व )






